*उम्र के साथ*

*उम्र के साथ*
मित्रों ! जीवन का रंग तब सुंदर लगता है जब घर में खुशहाली होती है और यह खुशहाली स्वतंत्रता से प्राप्त होती है आप एक बार सोचिए क्या आप खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं। आज हम सभी नौकरी की आपाधापी में जैसे खो से ही गए हैं। यदि इंसान अपनी प्रसन्नता के लिए कुछ सोच रखें तो प्रसन्नता चार कदमों से दौड़ते हुए आएगी लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है की हर कोई खुशहाल जिंदगी तो जीना चाहता है लेकिन खुशहाल रहने के लिए खुशी को नहीं ढूंढता है। ऐसा लगता है की खुशी कहीं गायब हो गई है और खुशी को तलाश है तो एक प्रयास की। न जाने कितने रोज जन्म लेते हैं और इस धरती में कितने समा जाते हैं लेकिन क्या कभी हमने ऐसा भी सोचा है कि हमारे ना रहने पर आने वाले समय में हमें याद किया जाएगा। ऐसा कैसे हो सकता है जरा सोचिए जब 24 घंटे के अंदर लगभग 18 घंटे तक मनुष्य इस व्यस्त दुनिया में अपने लिए कुछ भी नहीं करता है। सुबह से उठता है और दिनभर अपने कामों में लगा रहता है लेकिन उसे मिलता क्या है! क्या उसे जीवन में वह खुशहाली मिलती है जिसे वह इस माया रुपी दुनिया में खो चुका है। उमर बीतती गई एक दिन खुशी ने बड़े खुशी से कहा हे मानव तुमने मुझे तो खोजने की कोशिश ही नहीं की। मैं तो तुम्हारे पास ही थी लेकिन तुमने अपना सारा समय सोने और खोने में लगा दिया। अब तुम यह बताओ कि तुम्हारे पास पाने के लिए क्या है और खोने के लिए क्या नहीं है? मानव सोच में पड़ गया लेकिन खुशी को देखकर उसकी आंखें चकाचौध हो गई। वह तो खोज ही रहा था लेकिन समय के एक ऐसे पड़ाव पर आकर जहां से उसे इस जहां में अपनी झुर्रियां नजर आ रही थी पिचके हुए गाल ऐसा लग रहे थे मानो मटर की फलियां सूख गई हो और अब मटर के दाने चटक कर झांक रहे हो। जिंदगी की राह इतनी आसान नहीं होती जिसमें खुशी के साथ-साथ खुशहाली चारों तरफ नाचती हो। हंसी के मंजर का तांडव करती हो। धमा चौकड़ी मचाती हो। दिन बीते , सप्ताह बीते, महीने और साल बीते। न जाने कितनी, होली, दिवाली, फाग, मेले आए और गए लेकिन रंग नहीं छूटा तो संग भी नहीं छूटा। कोई खुशी के पीछे भागा तो कोई खुशी को लेकर नाचा। कभी कोई चाचा तो कभी कोई भतीजा बना। बच्चों को कांधे पर रखकर खूब नाचा । खेत – खलिहानों में जीत के गीत गाया। आया- गया और चला गया फिर भी ना मिली उसे चैन ना मिली उसे खुशी और ना ही मिले उसके रिश्ते। ऐसा खुशी ने तब कहा जब आदमी के पास अपने खुशी के लिए समय ही नहीं रहा। एक दिन खुशी के लिए आदमी बहुत छटपटाया लेकिन खुशी ने उसकी एक भी न सुनी। आदमी नाचना तो चाहा , गाना भी चाहा लेकिन ना पैर झूमें, ना तो गले से आवाज ही निकली। वह रूंध हो गया लेकिन आंसू भी ना निकले। अब खुशी तो एक सुंदरी की तरह लाल जोड़े में सजी हंसने के लिए बाहें फैलाएं खड़ी थी जिसे आदमी ने देखा सोचा कि गले लगा लूं लेकिन जैसे ही गले लगाने के लिए आगे बढ़ा वैसे ही हाथों ने जवाब दे दिया। पैरों ने कहा अब बस भी करो। बस चार कदम चले थे की खुशी ने कहा अरे अब तुमसे कुछ नहीं होगा। जब होना था तो तुम्हारे सिर पर मैं मंडराती थी। सोचती थी कि मेरी बाहों में तुम समा जाओगे लेकिन तुम तो निर्दयी और निर्मोही निकले। अब जब दांतों ने अपनी चमक खो दी है तब तुम हंसना चाहते हो। चेहरे की आभा अब तो रही नहीं तो सही क्या है और अब मैं कहां जाऊं क्या उसी चेहरे में जिसकी आभा और काया में मुझे समाने की नजदीकियां ही नहीं रही। बोलो तुमने ऐसा क्यों किया! किस कारण से चिंतित होते हो। अब तो मैं अपनी खुशी बटोर कर दरवाजे से निकल चली। ना अब मैं रही ना अब तुम रहे। रह गई तो हमारी तुम्हारी नोक- झोंक, गिले – शिकवे। ना अब तुम शिकायत करो और ना अब मैं शिकायत करुंगी। बस तुम मुझे देखो और मैं तुम्हें देखूं। हम दोनों अब मस्त हो जाना चाहते हैं एक – दूसरे की खुशी को देखने में । बस चुप रहो, कुछ भी मत कहो और कुछ भी मत सुनो। मगन होकर सोचो कि तुम मोरों की तरह नाचते हो। पपीहे की तरह बोलते हो। कोयल की तरह कू – कू करते हों। बाग- बगीचे में फूलों की तरह खिलखिलाते हो। बस इतना ही सोचो और मस्त रहो।

– डॉ• परमानंद शुक्ल “विद्या वाचस्पति”
( सर्वश्रेष्ठ हिंदी रचनाकार राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त लेखक)सं

स्थापक/ डायरेक्टर 

ज्ञान शक्ति सेवा फाउंडेशन नई दिल्ली भारत।

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